निर्मल गंगा अभियान और गांधी लोहिया उमा

निर्मल गंगा अभियान और गांधी लोहिया उमा

निर्मल गंगा अभियान और गांधी लोहिया उमा- अक्टूबर 1929 में गांधी संयुक्त प्रांत का दौरा कर रहे थे. इलाहाबाद पहुँचे तो कृषि वैज्ञानिक डॉ. सैम हिगिनबॉटम के फार्म में उनका काम देखने गए, जो मैले का वैज्ञानिक तरीके से निपटान और उपयोग पर काम कर रहे थे.

गांधीजी ने उनके काम से प्रभावित होते हुए कहा-

“यह कैसी विषम परिस्थिति है जहाँ एक ओर डॉ. हिगिनबॉटम मैले का आर्थिक और वैज्ञानिक ढंग से उपयोग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नगरपालिका मंडल इसकी दुःखदायी उपेक्षा करती है.

इस कारण हज़ारों रुपये का मैला हर साल बेकार जाता है और गंगा और यमुना का पवित्र जल ठीक उसी संगम स्थल पर दूषित हो जाता है जिसे देखने भक्तजन हज़ारों की संख्या में भारत के सभी भागों से दूर-दूर की यात्रा करके आते हैं.”

हालाँकि एक अन्य अवसर पर गांधीजी ने गंगा के भक्तजनों को भी आड़े हाथों लेते हुए 22 सितंबर, 1929 को नवजीवन में लिखा था-

“मैंने अपनी आँखों से हरिद्वार में स्त्री-पुरुषों को गंगा किनारे मल-मूत्र त्यागते हुए देखा है. जो स्थान इंसानों के बैठने के लिए है, तीर्थयात्री वहीं मलत्याग करते हैं.

फिर गंगा की उसी धारा में हाथ-मुँह धोते हैं, वहीं से पीने का पानी भरते हैं। तीर्थस्थानों के तालाबों की भी यात्रियों के हाथों यही दुर्गति होते मैंने देखी है .”

लोहिया ने नदियों सफाई के लिए की सरकारों को कितनी लताड़ लगाई थी

लोहिया ने नदियों और सभी जलस्रोतों की सफाई के लिए सभी स्तर की सरकारों को कितनी लताड़ लगाई थी, इसके बारे में कौन नहीं जानता.

आज एक बार फिर से लोहिया का 60 साल पहले का वह वक्तव्य पढ़ा जा सकता है-

“एक बार मैं महेश्वर नाम के स्थान पर गया जहाँ अहिल्या अपनी ताकत से गद्दी पर बैठी थी. वहाँ पर एक संतरी था. उसने मुझसे पूछा- ‘तुम किस नदी के हो?’ दिल में घर कर जानेवाली बात है. उसने मेरा शहर नहीं पूछा, भाषा भी नहीं पूछी, नदी पूछी.

कबीर ने कहा था-

माया महा ठगिनी हम जानी।
पंडा के मूरत होय बैठी,
तीरथ मंह भई पानी।

सब अपने ढंग से इसका अर्थ लगाते हैं. तीर्थ क्या है- पानी.  पानी को साफ करने के लिए आंदोलन चाहिए. लोगों को सरकार से कहना चाहिए— बेशर्म, बंद करो यह अपवित्रता.”
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एक आज का भारत, उसके छलनेता, उसकी खलनेत्रियाँ और सरकारें हैं.

‘साध्वी’ से मंत्री बन चुकीं हमारी बहन उमा तो अभी तक अपने नाम का मर्म भी नहीं समझ पाई हैं।

जिस उमा को भारत के लोग उसी हिमालय की तपस्विनी बेटी के रूप में पूजते हैं जहाँ से गंगा का उद्गम होता है, उस उमा की हमनाम पर दिनोंदिन सत्ता की मोटी चर्बी चढ़ी जा रही है और वह गंगा-सफाई के नाम पर लोगों को मूर्ख बनाने के खेल में शामिल हैं.

हँसी आती है कि आज के पापी अख़बारों ने उनके नाम के साथ ‘अमुक पार्टी की फायरब्रैण्ड नेता’ की उपाधि लगाते हुए खबरें छापी हैं. और वह फायरब्रैण्डा एक सत्याग्रही की मौत का अंदाजा पहले से होने का बयान देकर मानो अपने यौगिक अनुभव का बखान कर रही हैं.

देखना, ऐसे ‘फायरब्रैण्ड’ लोगों की ‘फायर’ कहीं सदानीरा गंगा की धारा को ही हमेशा के लिए सोख न ले.

डॉ राम मनोहर लोहिया तब और अब

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