MODI SARKAR में OBC पर जाने कब हुए हमले,हिन्दूत्व, पुलवामा के बाद पिछड़ो के नाम वोट

MODI SARKAR में OBC पर जाने कब हुए हमले,हिन्दूत्व, पुलवामा के बाद पिछड़ो के नाम वोट

MODI SARKAR में OBC पर जाने कब हुए हमले,हिन्दूत्व, पुलवामा के बाद पिछड़ो के नाम वोट

MODI SARKAR में OBC पर जाने कब हुए हमले,हिन्दूत्व, पुलवामा के बाद पिछड़ो के नाम वोट-प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहला मौका नही है। जब खुद को OBC वर्ग का बताकर वोट माँग रहे है।

वह 2014 में भी खुद को पिछड़ा बता चुके है।

हालही में गुजरात चुनाव में भी उनको खुद का पिछड़ा होना याद आया था।

लेकिन इस बार भी जैसा कि पहले से ही उम्मीद थी।

उन्होंने आज एक रैली में खुद को पिछड़े OBC वर्ग से बताया और कांग्रेस पर निशाना साधा रोते नजर आये।

MODI SARKAR में OBC और SC ST पर हुए हमले

कहां से ‘पिछड़े’ हैं आप? अगर आप सचमुच ‘पिछड़े’ हैं तो
1. आपके सारे दरबारी, सलाहकार और मददगार सिर्फ कुलीन, कारपोरेट और अगड़े क्यों है भाई?

2. आपके शासन में भारत के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में दलित-पिछड़े समाज के कितने बौद्धिक वाइसचांसलर बने?

3. संविधान के प्रावधानों को तोड़-मरोड़कर ‘अगड़ों’ को आरक्षण देने का फैसला किस सरकार ने किया?

13 सूत्री रोस्टर का मामला कहां से खड़ा हुआ? इस फैसले से सर्वाधिक घाटा दलित-पिछड़ों-आदिवासियों का हुआ!

4. आपके मंत्रिमंडल के शीर्ष 10 मंत्रालयों में पिछड़े समुदाय के कितने मंत्री हैं?

प्रतिभाशाली शोध छात्र ने किन राजनीतिक शक्तियों के उत्पीड़न से तंग आकर आत्महत्या की थी?

5. दलित-बहुजन समाज से आए रोहित वेमुला जैसे अत्यंत

6. भारत में ओबीसी कमीशन है। इसके जरिए पिछड़ों को खंड-खंड करने की योजना कौन बना रहा है? इसका कुल बजट कितना है?

7. यूपी में मुठभेड़ हत्याओं में मारे गये युवाओं में तकरीबन 60 फीसदी पिछड़े समुदाय के लोग हैं!

अपने को ‘ओबीसी’ बताकर अपने आपको ‘विक्टिम’ साबित करने में जुटे प्रधानमंत्री जी, ऐसा क्यों होता है?

8. अभी नौ लोगों को भारत सरकार में सीधे संयुक्त सचिव बनाकर पदस्थापित किया गया! इनमें कोई भी IAS नहीं!

फिर भी बन गए Joint secretary. इनमें कितने लोग ‘पिछड़े’ समुदायों से हैं प्रधानमंत्री जी?

9. बीते पांच सालों में भारतीय जेलों में पिछड़े वर्गों से आए विचाराधीन कैदियों की संख्या कितनी रही?

10. बीते पांच सालों में मौजूदा सरकार के विभिन्न कारपोरेशंस, थिंक टैंकों, बड़े संस्थानों और अन्य संस्थानों में ओबीसी समाज से कितने लोगों को नियुक्त किया गया?
किसे धोखा दे रहे हैं, जनाब?

MODI SARKAR में OBC के लिए क्या बड़े कदम उठाए गये

बहरहाल, ये देखना दिलचस्प होगा कि नरेंद्र मोदी जिस जाति समूह का खुद को सदस्य बताते हैं।

उसके लिए यानी ओबीसी के लिए वर्तमान सरकार ने क्या बड़े कदम उठाए।

केंद्र सरकार के मुताबिक ऐसा सबसे बड़ा कदम है राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देना।

इसके लिए 123वां संविधान संशोधन करके संविधान में एक नया अनुच्छेद 338बी जोड़ा गया।

आयोग को अब सिविल कोर्ट के अधिकार प्राप्त होंगे और वह देश भर से किसी भी व्यक्ति को सम्मन कर सकता है।

और उसे शपथ के तहत बयान देने को कह सकता है।

उसे अब पिछड़ी जातियों की स्थिति का अध्ययन करने और उनकी स्थिति सुधारने के बारे में सुझाव देने तथा

उनके अधिकारों के उल्लंघन के मामलों की सुनवाई करने का भी अधिकार होगा।

संविधान संशोधन विधेयक पर जो भी विवाद थे वे लोकसभा में हल हो गए और राज्यसभा में ये आम राय से पारित हुआ है।

अब इस आयोग को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग या राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के बराबर का दर्जा मिल गया है।

बीजेपी राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का दर्जा बढ़ाए जाने को सरकार की बड़ी उपलब्धि बता रही है।

लेकिन ये कह पाना मुश्किल है कि इससे देश की आधी आबादी यानी पिछड़ी जातियों के लोगों की ज़िंदगी में क्या बदलाव आएगा।

MODI SARKAR में SC ST की दशा और OBC को तीन वर्ग बाटना

ऐसे ही अधिकारों के साथ राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग या राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग खास असरदार साबित नहीं हुए हैं।

संवैधानिक दर्जा मिलने के बाद इतना समय नहीं गुज़रा है कि इस फैसले के असर की समीक्षा की जाए।

बीजेपी का ओबीसी आबादी के लिए दूसरा बड़ा कदम है।

ओबीसी जातियों के बंटवारे के लिए आयोग का गठन. 2 अक्टूबर, 2017 को केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत एक आयोग के गठन की अधिसूचना जारी की।

इस आयोग को तीन काम सौंपे गए हैं- एक, ओबीसी के अंदर विभिन्न जातियों और समुदायों को आरक्षण का लाभ कितने असमान तरीके से मिला, इसकी जांच करना।

दो, ओबीसी के बंटवारे के लिए तरीका, आधार और मानदंड तय करना, और तीन, ओबीसी को उपवर्गों में बांटने के लिए उनकी पहचान करना।

इस आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए 12 हफ्ते का समय दिया गया।

आयोग की अध्यक्षता पूर्व न्यायाधीश जी. रोहिणी को सौंपी गई हैं।

बीजेपी ने कहा है कि इस आयोग के बनने से अति पिछड़ी जातियों को न्याय मिल पाएगा।

इस आयोग के गठन के पीछे तर्क यह है कि ओबीसी में शामिल पिछड़ी जातियों में पिछड़ापन समान नहीं है।

इसलिए ये जातियां आरक्षण का लाभ समान रूप से नहीं उठा पातीं।

कुछ जातियों को वंचित रह जाना पड़ता है।

रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट वर्षो में भी नही आई

इसलिए ओबीसी श्रेणी का बंटवारा किया जाना चाहिए।

देश के सात राज्यों में पिछड़ी जातियों में पहले से ही बंटवारा है।

लेकिन जिस रोहिणी कमीशन को अपनी रिपोर्ट 12 हफ्ते में दे देनी थी, वो रिपोर्ट 12 महीने बाद भी नहीं आई है।

इस आयोग का कार्यकाल सरकार तीन बार बढ़ा चुकी है और आखिरी एक्सटेंशन के बाद अब आयोग को 20 नवंबर, 2018 तक अपनी रिपोर्ट सौंप गई थी।

लेकिन आयोग अब तक अपनी रिपोर्ट नही सौप पाया है।

OBC पर सरकार द्वारा खर्च किया जाना बजट

जहां तक ओबीसी के लिए सरकारी योजनाओं का सवाल है तो मोदी सरकार ने इस दिशा में कोई ब़ड़ा काम नहीं किया है।

ओबीसी के लिए अलग मंत्रालय बनाने की मांग को सरकार ठुकरा चुकी है।

ओबीसी के विकास का जिम्मा सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के अधीन है,

जिसे अनुसूचित जाति, विमुक्त जातियों और देश की आधी ओबीसी आबादी से लेकर बुजुर्गों, नशाखोरों,

भिखारियों, ट्रांसजेंडर और फिज़िकली चैलेंज्ड लोगों तक के विकास के लिए काम करना है।

मंत्रालय को इन तमाम लोगों के उत्थान के लिए 2018-19 के बजट में सिर्फ 7,750 करोड़ रुपए मिले हैं।

ओबीसी विकास का केंद्र सरकार का फंड वर्तमान बजट में सिर्फ 1,745 करोड़ रुपए है जो लगभग 70 करोड़ ओबीसी आबादी के लिए बेहद कम है।

प्रति ओबीसी केंद्र सरकार का सालाना खर्च लगभग 25 रुपए है।

बाकी योजनाओं का लाभ उन्हें मिलता है लेकिन ओबीसी विकास के नाम पर तो उन्हें पच्चीस रुपए सालाना ही मिलते हैं।

ये रकम भी नौ योजनाओं में विभाजित है।

OBC के बिजनेस के लिए लोन योजना जटिल

एक राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग डेवलपमेंट फंड भी है,

जिसका सालाना बजट 100 करोड़ रुपए हैं जिसे इसी 1745 करोड़ रुपए से निकाला जाता है।

इस फंड पर ज़िम्मा है कि वह ओबीसी उद्यमियों को लोन दे।

गौर करने की बात है भारत में मझौले उद्योग की परिभाषा के मुताबिक अगर

किसी उद्योग का सालाना टर्नओवर 250 करोड़ रुपए तक है तो वह मीडियम इंडस्ट्री की कैटेगरी में है।

इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि पिछड़ा वर्ग के उद्यमियों के विकास के लिए सरकार कितनी गंभीर है।

ये सारी समस्याएं पिछली सरकारों से चली आ रही हैं।

लेकिन हालात इस सरकार में भी बदले नहीं हैं, जिसका नेतृत्व एक स्वघोषित ओबीसी कर रहा है।

ओबीसी की राजकाज में हिस्सेदारी बेहद कम है और कांग्रेस के शासन की तुलना में उनकी स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है।

क्लास वन की केंद्र सरकार की नौकरियों में उनकी संख्या 13 फीसदी और क्लास टू की नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी 14.78 फीसदी है।

52 फीसदी आबादी के लिए ये बेहद कम है।

Sending
User Review
0 (0 votes)

Leave a Comment