जननायक कर्पूरी ठाकुर के डॉ राम मनोहर लोहिया पर विचार

जननायक कर्पूरी ठाकुर के डॉ राम मनोहर लोहिया पर विचार

जननायक कर्पूरी ठाकुर के डॉ राम मनोहर लोहिया पर विचार-डॉ लोहिया ने लिखा है कि विगत दो हजार वर्षों में देश में कोई आंतरिक क्रांति नही हुई, आंतरिक विद्रोह नहीं हुआ,

आंतरिक राजाओं के खिलाफ या बाहरी राजाओं के खिलाफ कुछ हुआ ही नहीं, क्यों?

अब इसकी उन्होंने खोज की है कि क्यों नहीं हुआ और जब खोज करने के बाद उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला

कि इस देश में जाति व्यवस्था के चलते एक वर्ग रहा- छोटा सा वर्ग सुविधा भोगी,

जो वर्ग रहा हैअधिकार भोगी और जो बाकी वर्ग रहा है

पिछड़ा वर्ग, उसको जरा व्यापक बनाइए, पिछड़ा वर्ग जिसमें औरतें भी हैं,

जिसमें हरिजन भी है, जिसने आदिवासी इत्यादि भी है, सब लोग हैं।

आपको पता होगा कि यह वर्ग चार नहीं है, यह वर्ग तो हम लोग पुस्तिकाओं में पाते हैं।

मगर अंत्यज लोगो को,अछुत लोगो को पंचम वर्ग की संज्ञा दी गयी, तो पंचम वर्ग भी रहा है,

लोग जो अधिक संख्या मे हैं वे निष्प्राण रहे है

तो डॉक्टर लोहिया ने कहा कि वे लोग जो अधिक संख्या मे हैं वे निष्प्राण रहे है,

अधिकारविहीन रहे है, उनको संग़ठन से कोई मतलब नही है।

एक छोटा सा वर्ग पुरस्कृत और अधिकारसम्पन्न रहा है।

यह जो है, उसको मिलाकर दो अंग रहा है जिनमे एक अंग रहा है तिरस्कृत और एक बहिष्कृत।

बहिष्कृत- तुम टोले में हमारे साथ नहीं रह सकते हो, टोले में हमारे साथ नहीं बैठ सकते हो, तुम बेंच पर हमारे साथ नहीं बैठ सकते हो-

हमसे अलग तुम्हारा टोला होगा, यानी तुमको जंगलों में जाना होगा तुमको पहाड़ों पर रहना होगा,

वह वर्ग है बहिष्कृत हरिजन और आदिवासी तथा दूसरा है तिरस्कृत जो पिछड़ा वर्ग है को कहा गया-

रहोगे तो हमारे गांव में मगर तुमको कोई सम्मान नहीं मिलेगा
तुमको कुछ इज्जत नहीं मिलेगी,तुमको प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी,

तुमको हम रे ते दे कहेंगे तुमको हम लतिआएँगे, जुतिजाएँगे।

तो यह तिरस्कृत और बहिस्कृत दो वर्ग रहे है यह दो वर्ग बहुजन समाज में है

इनमें कोई भूख नहीं थी कि हमको यहां कोई अधिकार भी मिलनेवाला है

मगर डॉ लोहिया ने कहा कि इन में कोई दम नहीं था,
इनमें ताकत नहीं थी, इनमें कोई भूख नहीं थी।

सच पूछिए तो इनमें कोई भूख नहीं थी कि हमको यहां कोई अधिकार भी मिलनेवाला है,

कोई अधिकार की भूख कोई संस्कार की भूख,
उनके अंदर कोई भूख नहीं थी।

भूख नहीं लगेगी,प्यास नहीं लगेगी, तो यह बहुजन समाज,

जो कर सकता था क्रांति, वह था बेदम, शक्तिविहीन, कुछ नहीं।

इसीलिए जो इतिहास के प्रोफ़ेसर है, उनको ज्यादा मालूम होगा,
लेकिन जैसा हमने कहा कि मैं एक अदना आदमी हूं,

लेकिन डॉ लोहिया ने कहा पिछले दो हजार वर्षों से पन्द्रह सौ वर्षों , खास तौर से पन्द्रह सौ से दो हजार वर्षों के अंदर,

भारत में कोई आंतरिक क्रांति नहीं हुई कोई आंतरिक विद्रोह नहीं हुआ और डॉक्टर लोहिया ने बहुत महत्वपूर्ण बात कही,

जो बात मन को छूने लायक है, उन्होंने कहा कि जो देश आंतरिक अन्याय से नहीं लड़ेगा,

अपने अंदर के राजा ,अपने अंदर के महाराजा ,अपने अंदर के बादशाह, अपने अंदर के सामंतो,

अपने अंदर के जमीदार, अपने अंदर के बदमाश तथा रंगदारों, सरदारों से नहीं लड़ेगा,

वह देश बाहरी आक्रमणकारियों से नहीं लड़ सकता ,बाहरी आतंकवादियों से नहीं लड़ सकता,

बाहरी हम अंदरूनी कमजोरियों से नहीं लड़ सकते तो,बाहरी कमजोरियां से कैसे लड़ेंगे?

घर मे सियार और बाहर शेर यह नही चल सकता।

समाजवाद तब तक अधूरा है जब तक समाजवादी में जन तंत्र नही है

डॉ लोहिया कि जो दृष्टि थी,वह व्यापक दृष्टि थी। उन्होंने सभी दृष्टि से समाज और जो कुछ भी उन्होंने पूंजीवाद के खिलाफ लिखा,

जो कुछ भी उनो ने सामंतवाद के खिलाफ लिखा ,

जो कुछ भी उन्होंने फासिस्टवाद के खिलाफ लिखा
और
जो कुछ उन्होंने कम्युनिस्ट तानाशाही एवं कम्युनिस्ट अधिनायकवाद के खिलाफ लिखा,

उसके बाद उन्होंने समाजवाद के संबंध में जो कुछ लिखा, उसमें जन तंत्र को जोड़ दिया,

कहा कि समाजवाद तब तक अधूरा है जब तक समाजवादी में जन तंत्र नही है।

अगर समाजवाद जुड़ जाएगा अधिनायकवाद से,

अगर समाजवाद जुड़ जाएगा तानाशाही से, चाहे वह तानाशाही फासिस्ट तानाशाही हो,

वह तानाशाही कम्युनिस्ट तानाशाही हो तो वह समाजवाद संसार के मनुष्यों के लिए,

सही इंसानों के लिए आजादी की चीजें, आजादी के साथ-साथ बराबरी की चीज नहीं बनाएगा,

बराबरी नहीं रह जाएगी, यह उन्होंने साफ-साफ लिखा।

इसलिए उन्होंने समाजवाद को जन तंत्र और लोकशाही से।

फिर उन्होंने समाजवाद को ना केवल जोड़ा आर्थिक और राजनीतिक कार्यक्रमों से बल्कि सामाजिक कार्यक्रमों से भी जोड़ा,

विशेष तौर पर उन्होंने भारत जैसे देश के लिए कहा कि यह जो अद्धिज है।

यह जो हरिजन आदिवासी हैं ,पिछड़े और औरते जो हैं,

इनको विशेष अवसर देना पड़ेगा मैं नहीं जानता कि हिंदुस्तान के किसी राजनेता ने दक्षिण भारत के रामा स्वामी नायकर को छोड़कर,

पेरियार को छोड़ कर और डॉ आंबेडकर को छोड़कर हिंदुस्तान के किसी राष्ट्रीय पार्टी के किसी ने नेता कहा कि हिंदुस्तान में जो अद्धिज है,

इनको विशेष अवसर मिलना चाहिए आरक्षण शब्द का इस्तेमाल

हिंदुस्तान जो सामाजिक शोषित है, पीड़ित हैं, दलित है राजनीतिक शोषण नहीं है, आर्थिक शोषण ही शोषण नहीं है,

सामाजिक शोषण भी शोषण है, तो जो सामाजिक दृष्टि से शोषित हैं,

राजनीतिक और आर्थिक शोषण के अतिरिक्त ये जो शोषित हैं,

इनको विशेष अवसर मिलना चाहिए आरक्षण शब्द का इस्तेमाल उन्होंने कहीं-कहीं किया है

अंग्रेजी शब्द प्रिफेरेंसियल ट्रीटमेंट मिलना चाहिए तो प्रिफेरेंसियल ट्रीटमेंट हम लोगो को मिलना चाहिए।

मैं नहीं जानता हूं कि किसी दूसरे नेता ने इतने जोर इतने स्पष्ट ढंग से यह आवाज उठाई हो।

डॉ लोहिया ने यह आवाज उठाई तो डॉ लोहिया को सनकी कहां गया जनवादी कहा गया।

‘उल्टे चोर कोतवाल को डांटे’ यह आज की दुनिया है और यह जो भारत का संस्कार है फिर ये ऐसा किया गया ।

दो तिहाई दुनिया अत्यंत बुरे हालात में पड़ी हुई है

मगर उन्होंने साफ साफ कहा, क्यों कहा, उनका सिद्धांत की दो तिहाई दुनिया भूखी है, दो तिहाई दुनिया नंगी है,

दो तिहाई दुनिया पिछड़ी है, दो तिहाई दुनिया अत्यंत बुरे हालात में पड़ी हुई है,

यह दो तिहाई दुनिया तिहाई दुनिया की हालत में बहुत बुरे हालात में है, उस दो तिहाई दुनिया का उद्धार करना है।

डॉ लोहिया के समाजवाद ने सिखाया उनको इस तरह से
डॉ लोहिया कि समाजवाद ने उनको सिखलाया कि जो भारत का पुरस्कृत समाज है,

इसीलिए मैं यहाँ इस सवाल को आप पर छोड़ देता हूं।

समाज के अतिरिक्त जो यहां तिरस्कृत और बहिस्कृत समाज है उसका भी उद्धार करना है।

डॉ लोहिया के समाजवाद ने हमको ऐसा सिखलाया और
इसीलिए डॉ लोहिया ने इन बातों की चर्चा बहुत विस्तार के साथ की।

मैं नहीं समझता कि इन बातों की चर्चा उतनी विस्तार से यहां करने की जरुरत है या करने की क्षमता मुझमें है।

दूसरी क़िस्त 

(यह भाषण कर्पूरी ठाकुर जी द्वारा एक महाविद्यालय में राम मनोहर लोहिया जी के सम्बंध में दिया गया था)

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