बेरोजगारी या चौकीदारी बड़ा चुनावी मुद्दा, मोदी सरकार में बेरोजगारी ने 45 वर्षो के रिकॉर्ड तोड़े

बेरोजगारी या चौकीदारी बड़ा चुनावी मुद्दा, मोदी सरकार में बेरोजगारी ने 45 वर्षो के रिकॉर्ड तोड़े

NSSO की रिपोर्ट

बेरोजगारी या चौकीदारी बड़ा चुनावी मुद्दा, मोदी सरकार में बेरोजगारी ने 45 वर्षो के रिकॉर्ड तोड़े-2019 का लोकसभा चुनाव शुरू हो चुका है प्रथम चरण के नामांकन हो चुके हैं द्वितीय चरण के नामांकन चल रहे है।

इन चुनाव में मोदी जी का मुद्दा हमेशा की तरह ही पर अनोखा है।

उन के समर्थक मैं भी चौकीदार की भगवा टोपी पहने या गमछा डाले आपको वोट मांगते नजर आ जाएंगे सोशल मीडिया पर है।

#मैं_भी_चौकीदार ट्रेंड कर रहा है।

इसी के विरुद्ध या कहे समानांतर एक और अभियान नौजवानों ने चला रखा है।

वह अभियान है #मैं_भी_बेरोजगार_हूँ।

नौजवान इस अभियान के द्वारा नौजवान मोदी जी को आईना दिखाने का काम कर रहे है।

यदि नौजवान चौकीदार है तो बेरोजगार कौन है। यही भी बड़ा प्रश्न है।

जिसको नौजवान लगातर चुनाव का मुद्दा बनाना चाहते है।

इस मैं भी चौकीदार अभियान के पीछे क्या तर्क है यह तो मोदी जी पता पायेंगे।

लेकिन मैं भी बेरोजगार अभियान की पीछे एक बड़ा तर्क है जिस तर्क से मोदी जी भाजपा सरकार मुह चुपा रही है।

वह तर्क भारत सरकार की संस्थान राष्‍ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) की एक रिपोर्ट है।

जिसकी चर्चा तब शुरू हुई जब अंग्रेजी अखबार बिजनेस स्टैंडर्ड ने इस रिपोर्ट का खुलासा किया है।

NSSO के अध्यक्ष और सदस्य ने दिया इस्तीफा

इस खबर को लिखने वाले सोमेश झा बताते है कि इस खबर की ओर उनका ध्यान तब गया।

जब NSSO के कार्यवाहक अध्यक्ष पी सी मोहनन एवं सदस्य जी वी मीनाक्षी ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया।

उनके पद छोड़ने का कारण भारत सरकार द्वारा बेरोजगारी के आकड़ो को सार्वजनिक न करना था।

क्योंकि यह खबर भारत मे बेरोजगारी के भयावह दशा को उजागर करती है।

इस रिपोर्ट की माने तो भारत मे नोटबन्दी के बेरोजगारी ने पिछले 45 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है।

सरकारी निधि द्वारा संचालित राष्ट्रीय सांख्यिकी आयाेग के प्रमुख पी सी मोहनन ने इस्तीफा देने के

पहले कहा कि वो आैर उनकी सहकर्मी जे मिनाक्षी नौकरियों संबंधित डेटा पब्लिश न करने को लेकर नाखुश थे।

उन्होंने कहा ये अांकड़े दिसंबर 2018 में ही जारी हो जाने चाहिए थे।

लेकिन बैक डेटेड GDG डेटा को लेकर सरकार एजेंसियों द्वारा हस्तक्षेप भी किया गया था।

इस माह में ही, सेंटर फाॅर माॅनिटरिंग इंडियन इकोनाॅमी के थिंक-टैंक ने कहा था

कि भारत में पिछले साल करीब एक 1.1 करोड़ लाख लोगों ने अपनी नौकरी गवांर्इ है।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष प्रमुख गीता गोपीनाथ ने भी उठाये सवाल

जनवरी माह में यह खबर चर्चा का विषय रही थी कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष प्रमुख गीता गोपीनाथ ने

स्विटजरलैंड के डावोस में चले वर्ल्ड इकोनाॅमिक फोरम में पत्रकारों से बातचीत में  कहा था कि भारत में

बेरोजगारी केंद्र सरकार व वैश्विक अर्थव्यवस्था के परिदृश्य से चिंताजनक है।

गीता गोपीनाथ की बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह पूर्व से भाजपा समर्थन में बोलते रहे है।

हालांकि, गीता गोपीनाथ ने साथ में यह भी कहा था कि 2019 में वैश्विक अर्थव्यवस्था स्लोडउन की तरफ इशारा कर रहा है

लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था 7-7.5 फीसदी की रफ्तार से आगे बढ़ने का अनुमान है।


पढ़े रिपोर्ट जिस पर मचा बवाल

रिपोर्ट के मुताबिक 2017-18 की बेरोजगारी दर 1972-73 के बाद सबसे ज्यादा है।

बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक देश के शहरी इलाकों में बेरोजगारी दर 7.8 फीसदी जबकि ग्रामीण इलाकों में 5.3 फीसदी है।

15-29 साल के शहरी पुरुषों के बीच बेरोजगारी की दर 18.7 फीसदी है। 2011-12 में ये दर 8.1 फीसदी थी।

2017-18 में शहरी महिलाओं में 27.2 फीसदी बेरोजगारी है जो 2011-12 में 13.1 फीसदी थी।

इस लिंक पर क्लिक करके पढ़े पूरी रिपोर्ट

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